एक और मधुशाला:संजय सनम
खुमारी
जब जिक्र मधुशाला का है तो ख़ुमारी तो होगी ही और अलग अलग मायने से होगी-----
ख़ुमारी सिर्फ शराब से भरे जाम से ही नहीं आती वो तो नज़रों में भरी शराब से भी आती है और हसीना के हुस्न के अंदाज पर भी आती है।
ख़ुमारी इश्क़ के आदाब पर भी आती है --महबूब के इंतजार पर भी आती है और बेक़रार दिल के क़रार पर भी आती है।
ख़ुमारी तो कभी किसी नाम पर भी आती है--वो तो कभी किसी की अदा और अंदाज पर भी आती है और कभी कभी तो मादक आवाज़ पर भी आती है।
ख़ुमारी शब्दों से भरे कागज़ और उन आखरों में बोलती मोहब्बत और दर्द भरे इंतजार की बोलती क़लम के कलाम पर भी आती है।
सच पूछिये तो कभी यार पर आती है कभी बेक़रार पर भी आती है कभी उसके प्यार पर आती है तो कभी इक़रार पर आती है।
यह नशा है जिंदगी का-कभी किसी की याद पर भी आती है तो कभी तन्हा रात पर भी आती है।
कुछ इन राहों से गुजरती मेरी क़लम की यह दास्तां है मेरे दिलवर।
कही मयखाने की मचलती अंगूरी तो कही साकी की मादकता---पता नहीं किस किस की आई है और मेरी क़लम ने भी स्याही की जगह उसे ही पिया और जो जिया वो लिख दिया।
कभी किसी के अश्क़ भी ------तो कत्ल कर देते है और मतवाला बना देते है तो कभी लबो की पंखुरियां जब खुलती है तब मस्त मदमाती बयार सी आ जाती है।
आइये मेरे साथ इस डगर पर----डगमग से करते क्योकि यह मस्ती है जो क़दमो को सीधे चलने भी कहा देती है------
मेरे साथ चलते चलते आप "खुमारी"को पकड़िएगा क्योंकि यह खुमारी वो नही जिसके बाद कदम लडखड़ाए और इतने लड़खड़ाए कि शरीर कदमों को ही नहीं सम्हाल पाए और लड़खड़ाते कदम डगमगाते हुए किसी राह पर ज़बाब दे दे और बेचारे शरीर को जमीन पर ला दे...
ऐसा भी क्या नशा या खुमार कि आपको आपके तन का ही होश नही रहे और आप किसी सड़क पर कभी किसी दीवार के पास,कभी किसी नाली के पास बेसुध मिले।
वो खुमारी फिर किस काम की जो बेसुधी में दीवारों से लड़ते भिड़ते लहूलुहान कर दे और आपको पता ही नही चला कि बेसुधी शरीर को बेवजह की सजा देती रही...आप दीवारों से टकराते रहे और शरीर पर जख्म के निशान बनते रहे...
कभी सर फूटते रहे... लहू निकलता रहा और कभी सर के साथ साथ शरीर के अन्य अंगों को भी दीवारों का कोपभाजन पड़ना पड़ा।
न जिस्म के जख्मों का होश और न ही शरीर पर बेतरतीब उन कपड़ों का होश।
ऐसा नशा भली मधुशाला को क्या बदनाम नहीं करता!
अब आप सोचिए उस बेसुध नशेड़ी को यूं सड़क पर पड़े देखकर उस राह से गुजरने वाली महिलाएं बेचारी क्या सोचती होगी
और कई बार तो महिलाएं ऐसे दृश्य दूर से ही देख कर अपनी राह बदल देती होगी।
ऐसे नशेड़ी जो मधुशाला और शराब की मर्यादा और गरिमा नही समझते
वे बेचारी मधुशाला,मदिरालय , साकी,शराब,पैमाने का नाम खराब करते है पर कुसूर थोड़ा सा उनका भी है जो इनको आने देते है।
"एक और मधुशाला" का दरवाजा इनके लिए नही खुलता क्योंकि हमारी मधुशाला में शराब से कही अधिक शबाब है..इजहार है...प्यार है..कोई बेकरार है तो किसी को करार है और जो मर्यादा के साथ रहने का करार नही कर सकते वे हमारी एक और मधुशाला का हिस्सा नहीं बन सकते।
हम यह मानते है कि नशा हो तो सुकून के लिए हो... ताजगी के लिए हो....एक नई ऊर्जा के लिए हो...वो शराब के पैमाने से भी आ सकती है और शबाब भरी नजरों से भी आ सकती है।
मचलते हुस्न की अंगड़ाई भी मन को ऊर्जित कर सकती है तो कभी दूर बैठकर सिर्फ नजरों के नजारों की मादकता भी मन की तन्हाई को रफु चक्कर कर सकती है।
एक और मधुशाला के दरवाजे पर किसी से प्यार भी हो सकता है और कोई हाथ आपके दिल पर धीरे से अपना अहसास भी रख सकता है।
कोई हसीना आपकी छाती पर अपना सर भी रख सकती है और आपकी अंगुलिया उसकी घनी जुल्फों में अठखेलियां करती हुई कही खो भी सकती है।
बहुत करीब अर्थात इतने करीब भी आ सकते है कि धड़कनों को भी एक दूजे की सुना जा सकता हो..जुल्फों से खेलते हाथ उतरते हुए बदन पर ठहर भी सकते है और लबों से लब मिल भी सकते है।
एक और मधुशाला मोहब्बत की शराब का नशा और उसमे बिंदास अंदाज हो सकता है और उससे भी अधिक हो सकता है क्योंकि जब दो दिल एक दूजे में खो जाए और एक दूजे के हो जाए तो फिर हमारे नियम उनको नही रोक सकते..
हमारी मर्यादा को मोहब्बत से बंध कर वासना का यह तूफान इसलिए नहीं रोकता
क्योंकि ये सड़क पर कोई तमाशा नहीं कर रहे होते है....ये अपनी दिल की हसरत को लबों से भर भर धीरे धीरे उतर रहे होते है...
ये खुली सड़क पर नहीं कर रहे है और न ही किसी से जबरदस्ती है बल्कि दो दिलों की रजामंदी है और अपने मन की अतृप्त आग को मन की चाहत के साथ जिस्म से तृप्त कर रहे है
करने दीजिए न.... मैं नहीं रोकता...मर्यादित है और अपनी इच्छा के साथ दोनों का भाव और जिस्म का जुड़ाव है..
यहां यह जोश "एक और मधुशाला" में ठंडा भी नही होता...हर एक चुम्बन दोनों को और जोशीला करता है और और अधिक ऊर्जा के साथ लबों की शराब पीते रहते है...
धीरे धीरे अंगूरी वाली पीने वालों के जाम भी 3 घंटे में खत्म हो जाते है पर ये जिस्म तब भी चिपके ही रहते है ... ओंठ लाल हो जाते है पीते पीते पर दोनों का दिल फिर भी नही भरता.
असली मधुशाला तो यही समझते है कि जिसका जाम न खाली होता है और न मादक को खाली होने देता है....अब यहां साकी अर्थात वो महिला प्रेमी जाम परोस नही रही होती बल्कि खुद पी भी रही होती है और पिला भी रही होती है।
बेशक बच्चन जी को पढ़कर यह कृति लिखी गई है पर यह जीवन की उस सच्चाई को भी बिंदास बोल रही है जिसको साफ साफ लिखने से बड़े बड़े कतराते है...
.हुस्न के इस सच को मन के उबाल के साथ सेकते हुए मैं आपकी भावनाओं को गुदगुदाता हुआ ले चलने को संकल्पित हूं।
प्रिय पाठक यह सच है की एक और मधुशाला में बहुत कुछ खुला रहेगा लेकिन मर्यादा के परदे के अंदर रहेगा। हम उस गुस्ताखी को बर्दाश्त नहीं करेंगे जो मधुशाला पर प्रश्नचिन्ह लगाती हो।
आप जरा सोच कर देखिए कि पीने के बाद अगर व्यक्ति जीना भूल जाए अपनी सुध बुध ही खो बैठे और हालात ऐसे हो जाए कि लोग उस पर हंसने लगे उसका मजाक उड़ाने लगे और कहीं ना कहीं मधुशाला को कोसने लगे तो वो स्थिति एक और मधुशाला में आपको नही दिखेगी।
जरा सोच कर देखिए अपने परिवार के किसी भी व्यक्ति को इस स्थिति में देख कर के उसके परिवार पर क्या गुजरती होगी! उसके परिवार वाले फिर शराबखाने को और मदहोश करने वाली उस शराब को ना जाने कितना कोसते होंगे!
हमारी मधुशाला वह है जिसमें नशा तो है लेकिन होश भी है जिसमें ताजगी है पर उस ताजगी के साथ तहजीब भी है इसलिए हमारे यहां बहुत कुछ खुला रह कर के भी ऐसा नहीं होता कि जिस पर मखौल उड़ाया जा सके... जिस पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सके इसलिए एक और मधुशाला का सफर बिंदास होगा उसका खुला अंदाज भी होगा पर जितना भी होगा मर्यादित होगा अपनी संस्कृति के अंदर होगा ।
जीवन में जो कुछ प्यार मनुहार के साथ और बाद घटता है प्रायः प्रायः वह सब कुछ यहां हो सकता है लेकिन पर्दे के अंदर खुली सड़क पर नहीं।
यह महफिल मर्यादित महफिल होगी और यह फर्क करेगी की आम मयखाने में और एक और मधुशाला के इस मयखाने में और इसमें आने वाले लोगों के बीच में उनकी समझ में उनकी मानसिक स्थिति में उनकी क्रिया में उनकी प्रतिक्रिया में कितना बड़ा अंतर है!
एक और मधुशाला में जिनको शराब पीनी है वह शराब पी सकते है और जिनको नजरों की अंगूरी पीना है शबाब करना है जिनको हुस्न का जाम लेना है वह हुस्न का जाम ले सकते है पर शर्त सिर्फ इतनी सी जो दृश्य सभ्य समाज में खुले रुप में नहीं देखे जा सकते वह दृश्य खुले रूप में ना आए।
मोहब्बत की जा सकती है और इस तरह से भी की जा सकती है कि जमाना भी देखें और उससे प्रेरणा ले लेकिन मोहब्बत के बाद का जो समर्पण है इस समर्पण में फिर दो दिलों को यह भान नहीं रहता कि क्या दिखाना है क्या छुपाना है !एक और मधुशाला बस यहीं पर पर्दा करती है आप पर कोई पाबंदी नहीं है अगर दो दिल राजी है आप की रजामंदी है तो फिर आप आंखों की भाषा से और लबों की परिभाषा से भी नीचे उतर सकते हैं शर्त सिर्फ इतनी कि वह सब कुछ पर्दे में होना चाहिए मर्यादित रहना चाहिए।
हमारा पैगाम साफ है दिल वालों के लिए कोई रोक-टोक नहीं है पर रजामंदी जरूरी है और मर्यादा भी जरूरी है।
इस बात को बार-बार जोर दे करके कहना जरूरी था क्योंकि नहीं तो मधुशाला को लोग शराब और शबाब का अड्डा समझ लेते हैं और उसमें भी सब कुछ खुला समझ लेते हैं हमारी इस मधुशाला में शराब और शबाब तो भरपूर रहेगी पर उसके साथ एक लक्ष्मण रेखा भी साथ साथ चलेगी।
बड़ा आश्चर्य लगेगा आपको कि सब कुछ हो रहा है दिलों की मस्ती में कोई रोक-टोक नहीं है दिलों की चाहत में कोई रोक-टोक नहीं है जिस्म के मिलन में कोई रोक-टोक नहीं है। कितना खुला आमंत्रण है पर इस आमंत्रण के साथ एक छोटा सा ही तो निवेदन है कि शराब और हुस्न का नशा जरूरी हो सकता है पर दिखावा जरूरी नहीं है ।
आपकी अपनी मस्ती आपकी है आप अपनी ऊर्जा लीजिए अपने दोस्त को ऊर्जा दीजिए और एक दूजे के तन और मन को सुकून दीजिए और जीवन को एक नया रंग रस दीजिए।
इसमें आपको कोई नहीं टोकेगा आपको कोई नहीं रोकेगा आप खुद सोचिए आपकीमस्ती आपकी अपनी है उसमे दिखावा क्या जरूरी है!
एक बात जान लीजिए जहां छिपाव जरूरी है वहां दिखावा अपराध बन जाता है ।जहां आपकी प्राइवेसी जरूरी है वहां खुला ऐलान आपके व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह बन जाता है ।
इन सब छोटी छोटी बातों पर यह एक और मधुशाला बहुत संजीदा है क्योंकि हम जानते हैं कि पीकर के बहकने वालों के हालात क्या होते हैं! फिर इनके अंजाम क्या होते हैं!
यहां एक बात और साफ है कि शराब और शबाब के साथ लोग कबाब की भी कुछ सोच ही लेते होगें पर इस मधुशाला में कबाब दूर दूर तक नहीं होगा इसलिए शाकाहारी के लिए ही यह मयखाना उपयुक्त रहेगा...क्योंकि कबाब हमारे अपने आदर्शों की संस्कृति और संस्कार का हिस्सा कभी नहीं रहा और न ही रहेगा।
खुले शब्दों में पर्दे के पीछे आपकी मस्ती की भाषा तो एक दूजे की उस मस्ती में नॉन वेज हो सकती है पर खान पान में नॉन वेज नही हो सकता इसलिए मुझे माफ कीजिएगा।
हम जिस मर्यादा के पर्दे की बात कर रहे थे वो पर्दा यह कहता है कि एक और मधुशाला का सबसे बड़ा सूत्र है कि मदहोशी में भी होश चाहिए ...अतिरिक्त खुलेपन पर साहब अपने मन की ही रोक चाहिए...
यह जमाना हमें बदनाम न कर सके इतना होश जरूरी है... मस्ती के आयाम सब कुछ हो पर बस्तियों को उतना ही दिखे जितना हम दिखाना चाहे ..राज को राज ही रखा जाए जहां पर्दा जरूरी है वहां घुंघट न उठाया जाए।
यहां अब तक बात हुई जिनको नजरों से नजारें मिल गए पर क्या ये सबको ही मिल जाते है...कुछ तो पहले से ही दिलजले सुकून के लिए आते है...बेचारे पहले से ही अपने दिल तोड़ कर आते है...उनको भी तलाश रहती है कि कोई हसीना अपने हुस्न की छांव दिल की इस तपिश पर दे दे...कोई अपनी निकटता की सरगम दे दे...कोई तो अपने कंगनों की खनखन उसके नाम कर दे और कोई अपने पैरों की पायल के बजते घुंघरू से निकलती छम छम से खुला पैगाम दे दे।
शराब और शबाब की इस मस्ती का प्रसाद सबको अपने मुताबिक कब मिलता..अक्सर जिसको चाहते है वो किसी और की बांहों में दिखती है तब दूसरी,तीसरी, चोथी और न जाने कहां तक आकर फिर कोई कुछ को मिलती है और उनको भी यह सोच कर कि नहीं से
तो फिर यही अच्छी है उनके हुस्न की तारीफ में कसीदे पढ़ने पड़ते है...कमर सी कमरिया को भी लचकती कमरिया मजबूरी में कहना ही पड़ता है क्योंकि बेचारे पुरुष के पास विकल्प नहीं है ।इस कड़वे सच पर क्या कहेंगे!
अब और आगे कहने से पहले आपके मन की उस तरंग को होले से जवाब दे रहा हूं जो कही न कही मेरा परिचय मांग रही होगी!
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