तर्पण
अर्पण में समर्पण था पर तर्पण में विछोह है और जब कोई हालात ऐसे हो जिनमे दर्द के साथ अपनी जिम्मेदारी के सही रूप से निर्वाह नहीं करने का पछतावा भी हो तब इंसान के लिए बहुत तकलीफदेह स्थिति हो जाती है। काव्यात्मक अंदाज में वो सब कुछ लिखा है जो दर्द सहा है..... तर्पण अगर कोई पुत्र अपने पिता के अंतिम समय पर उपस्थित होकर अपने कर्तव्य का पालन न कर सके तो यह कसक ता उम्र उसके दिल को कचोटती रहती है। वक्त की दी इस चोट का दर्द में आज भी महसूस कर रहा हूँ-- आज भी मेरी आँखों में कैद है वक्त का वो काला पन्ना––– कदमो के नीचे से जैसे जमीन का खिसक सा जाना– याद है सर से जैसे अचानक बरगद की छांव का सरक सा जाना व् अनाथ सा हो जाने की पीड़ा–– –दुनियादारी का कड़वा सच और पिता की छत्र छाया न होने से जमाने का बदलता रंग ।नहीं भूल सकता पिता का संघर्ष और उत्कर्ष––और आखिरी मोड़ में यह अभागा पुत्र अपना कन्धा तक नहीं दे सका आज भी अपने ही दिल की धिक्कार सुनता हूँ और कई बार तन्हा रोता भी हूँ।सुना है कि वक्त के साथ यादे कमज़ोर हो जाती है पर मुझे तो मेरे पापा दो दशक गुज़र जाने के बाद आज भी वैसे ही याद आते है। आज भावों के पात्र...