मेरा परिचय जानना चाहेंगे!

मेरा परिचय जानना चाहेंगे!

परिचय

क्या कहूं बतौर परिचय -

आपका अपना हूँ--- आपकी आँखों के सपने कह रहा हूँ --आपके दिल की धड़कनों की सरगम सुन रहा हूँ और वो आपको लिख रहा हूँ।
एक कलमकार का परिचय उसकी कलम से निकले शब्द और दिल से उमड़े भाव और कागज़ के वे पन्ने होते हैं जिसमें वो ज़माने को लिखता और ज़िंदगियों को कहता है।
परिचय उसके शब्दों में  छिपा सावन भी होता है और अश्कों से लबालब तरानों के मुखड़ों का समन्दर भी होता है।
बस मुझे मेरे शब्दों से पढ़कर अपने दिलों में खोजिए, मेरा परिचय आपके लबों से निकले, कोई नाम व पैग़ाम बनकर, तब मेरी यह साधना सफ़ल होगी और मेरा सफ़र आगे की मंज़िल को तय करेगा।

अर्पण

डॉ बच्चन जी को विन्रम भाव से समर्पित–

उनकी कलम उत्प्रेरक  और उनकी कृति मधुशाला

के एक एक आख़र में भरी मादकता ने मेरी क़लम में खुमार ही भर दिया..

सोचता हूँ जिसकी क़लम में इतनी मादकता थी  वो शख्स फिर कितना मादक रहा होगा?

एक और मधुशाला को इन भावों के साथ महाकवि को अर्पण कर रहा हूँ–––––

प्रेरक बने श्री बच्चन

बनी प्रेरणा मधुशाला

शब्द पुष्प् से सजा रहा हूँ

भाव वंदन की माला

है अर्पण उनको  मेरी

ह्रदय सागर की हाला

स्वीकार करो ऐ सिंधु महाकवि

बिंदु बिंदु में ये  मधुशाला।

जिनकी कृति को  पढ़कर मन के सागर  से भावों की लहरें उठी और एक और मधुशाला की आधार शिला बनी उन महाकवि को भला कैसे विस्मृत किया जा सकता है!

यह सच है कि इस कृति की प्रेरणा महाकवि बच्चन जी की मधुशाला ही बनी है और सिर्फ एक बार ही संभवतयापढ़ी गई है उसको पढ़ने के साथ ही जैसे भाव मन में आने लगे तब मुझे यह लगने लगा था कि कुदरत अनायास ही कुछ लिखवाना चाह रही है और इसी वजह से मैंने उस अमर कृति को बार बार नही पढ़ा क्योंकि मेरी कलम में फिर उनके शब्दों का और अंदाज का प्रभाव लिखने लगने का डर था इसलिए मन पुनः पढ़ने का होने के बाद भी मैने उसको नही पढ़ा।

दोस्तों 

हमारे शास्त्रों में कहा जाता है कि शब्दों में बड़ी शक्ति होती है क्योंकि शब्दों से ही सिद्धिदायक  मंत्रों की रचना होती है...शब्द ही यंत्र का निर्माण करते है...क्योंकि कोई भी यंत्र भी तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसकी संरचना में उचित शब्द स्थापित नहीं हो जाते अर्थात यंत्रों की आकृति नुमा संरचना की उस ऊर्जा में जब तक उन शब्दों की ऊर्जा की स्थापना नही हो जाती तब तक आकृति नुमा संरचना की एनर्जी एक्टिव अर्थात सक्रिय नहीं होती अर्थात यंत्र बिना शब्दों के ऊर्जित नही हो पाते।

शब्दों की ऊर्जा मुझे यहां प्रत्यक्ष अनुभव हुई और मुझे यह प्रतीत हुआ कि शास्त्रों की बाते कितनी गूढ़ और सत्य है।

आप किसी बात या सिद्धांत को सुन कर मानने के लिए तैयार होते है और वो सत्य आप अपने जीवन में खुद घटित हुआ देखते है उसमे अंतर होता है...शास्त्र की बात हम मानते है पर वो जब तक अनुभव नहीं हो जाती तब तक उसमे फिर भी मन का उतना विश्वास नहीं जुड़ता।

मैने शब्दों की ऊर्जा साक्षात देखी है कि शब्दों से गूंथे छंद किस तरह मन के सागर में अचानक तूफान ला देते है और आपको दिखती है अपने नव तरंगित भावों से गूंथी शब्दों की नई  कतारें और वे शब्द मन के अंदर के अहसास को आवाज देते दिखते है... उन आवाजों को सुनने के बाद रुकना बहुत मुश्किल होता है और मन की ये बैचेनी फिर पूरी के जगन्नाथ मंदिर में लाकर सागर तट की उस चिकनी रेत पर बिठा देती है। अगर एक कृति के शब्द एक बार पढ़ लेने के बाद दूसरी कृति के निर्माण की आधारशिला रख सकते है तब यह ताकत मन की भावनाओं को शब्दों के साथ आवाज  इतनी बुलंदी से देते है।

एक और मधुशाला  का एक संदेश यह भी है कि शब्दों की हो इबादत...शब्दों से शिकायत नहीं हो....क्योंकि शब्दों की ऊर्जा  ब्रह्मांड में विचरती है और भावनाओं को नित नया आकार देती है इसलिए शब्दों की इबादत ही होनी चाहिए....मक्कारी नहीं।

इस पन्नें में अर्पण भी है और तर्पण भी है और दोनों ही शब्द हमारी प्राचीन संस्कृति की उस    संस्कारित परंपरा से जुड़े है जो संस्कार में समाए रहते है।

अर्पण के भाव में समर्पण की खुशी है...कृतज्ञता का अहसास है.. जिनसे कुछ मिला और उसके लिए धन्यवाद का भाव भी अर्पण हो जाता है।

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