एक और मधुशाला ..मन की बात
एक और मधुशाला"> (मन की बात) क़लम चलाने के लिए या तो जीवन की कोई घटना प्रेरणा बनती है या फिर कोई साहित्य कृति या रचना मन में भावनाओं की लहरों को मचलने का कारक बनती है।
शब्दों का मज़मा यु ही नहीं लगता कभी कोई अश्क़ का कतरा सागर बन जाता है या कोई मुस्कान सावन बन जाती है।कभी कोई नज़र आरपार हो जाती है या कभी कोई पलक छांव बन जाती है। कोई भी रचना कागज पर तब यु उतरती है जैसे फ़लक पर बादलों की घटाए उमड़ती है या फिर समन्दर में मौजे मचलती है––कुछ ऐसे ही" एक और मधुशाला" का सफ़र शुरू होता है जब डॉ हरिवंश राय बच्चन जी की कृति "मधुशाला" पलकों के नीचे आती है और एक एक रुबाई मन के पैमाने को जीवन के विभिन्न रंगो से भरती जाती है।मधुशाला के पन्नों की मादकता मेरी नज़रो से होकर मेरे दिल में इतने गहरे उतर जाती है कि वहां से "एक और मधुशाला" की नदी निकल जाती है। प्रकृति में नदी समन्दर में मिलती है पर यहाँ तो मधुशाला के समंदर से "एक और मधुशाला"की नदी निकलती है। मेरी यह कृति ""मधुशाला"" और उसके रचियता शब्द पुरुष डॉ हरिवंश राय वच्चन को समर्पित करने से पहले मेँ माँ सरस्वती और मेरी इष्ट माँ सच्चियाय को प्रणाम करता हूँ।
मेरा प्रणाम मेरे पूर्वजो को व् जगत की समस्त दैविक शक्तियों को सादर समर्पित है।मेरी इस कृति को पुस्तक व् ऑडियो सी डी में लाने के लिए मुझे उत्साहित करने वाली राष्ट्रीय स्तर की कहानीकार लेखिका श्रीमती शुक्ला चौधरी का मार्ग दर्शन अत्यंत प्रेरक रहा है। एक कुशल सारथि की भूमिका श्रीमती शुक्ला चौधरी ने मेरी साहित्यिक यात्रा में निभाई है–उनके इस योगदान को विस्मृत ता उम्र नहीं किया जा सकता।में तहे दिल से उनके इस साथ का अभिनंदन करता हूँ।जीवन में कब कोई साथ ऐसा मिल जाए––कब कोई न मिलकर भी आपके जीवन का मधुमास बन जाए–आपके लिए प्रेरणा व् उत्साह बन जाये और आपके शब्दों का वो विन्यास बन जाये कहा नहीं जा सकता? फेस बुक की मित्रता सूचि में जिसे पाकर खुद को धन्य महसूस करता हूँ मेरी उस खास मित्र का जिक्र किये बिना मेरी यह यात्रा पूरी नहीं हो सकती और वो नाम है शब्द राह की मनीषी मेरी अनन्य मित्र श्रीमती सारिका बाहेती –––जो मेरी खूबियों को बताती है और मेरी भूलों को हटाती है इसलिए हृदय का आभार उनके लिए भी बनता है और में उनको दिल से समर्पित करता हूँ। E-बुक के रूप में मेरी कलम को विश्वमंच के विशाल पाठक संसार तक लाने का सुझाव मेरी एक खास ज्योतिष मित्र व लेखिका श्रीमती मैना भटनागर का रहा है।
सोशल मीडिया-ऑन लाइन के इस दौर में इस रूप में शब्दों की आवाज़ दिलों तक पहुंचाने की प्रेरणा व श्रम अदा करने वाली मेरी इस स्नेहिल दोस्त का दिल से आभार ज्ञापित करना भला कैसे भूल सकता हूँ!
मेरा दिल से आभार हिंदी के उत्साही विस्तृत पाठक परिवार के प्रति है जो पढ़ कर शब्दों की आवाज बनते है और जब प्यार लुटाते है तब क़लमकार की शौहरत का मुक़ाम बनते है। मेरी इस कृति में मदिरा मादक प्याला हाला साकी बाला के प्रतीकों से जीवनन के कड़वे सच से लेकर देश की कई समस्याओ को अपने अंदाज में कहने की कोशिश की है।पारिवारिक रिश्तों से लेकर सीमा पार के रिश्तों तक क़लम ने अपनी बात रखी है।मोहब्बत शांति क्रांति से होकर मानवीयता के उसूलो तक का सफ़र किया है और आतंकवाद पर कड़े शब्दों से प्रहार भी किया है। समन्दर के किनारे की बालू रेत पर बेठ कर समन्दर की गर्जना व मौजो की मचलन से जीवन के सफ़र की रवानी को लिखा है। देश के लिए मर मिटने वाले रण बांकुरों की शहादत को सलाम भी किया है तो झूठ की सियासत पर प्रहार भी किया है–– मज़हब की दुकानों व् धर्म ईमान के ठेकेदारो को कठघरे में खड़ा किया है। जीवन सफर के तमाम सवाल जो कभी कभी हर एक को परेशान भी करते है उनको जिंदादिली से क़लम की नोक पर उठाया है।
व्यवस्थाओँ की विसगंतियो को लताड़ा है तो जवां दिलो को मोहब्बत के फूलों से सहेजा भी है। पेट की आंच पर जिस्म बेचने वाली योवनाओ की पीड़ा को आवाज़ दी है तो छोटे बच्चों के भारी बस्तों वाली शिक्षा नीति को फ़टकार भी दी है।
मैंने अपनी तरफ़ से ज्वलन्त हर विषय को छुआ है । आपको भी लगेगा कि कही कही तो क़लम से जलते अंगारे को जैसे पकड़ा है।पर असली निर्णायक आप पाठक होंगे–––
मेँ कहा तक सफल हुआ यह निर्णय आप देंगे।मेरा आपसे यह वादा है कि आपकी नसीहत के आधार पर मेरी अगली कृति आएगी पर एक आरजू कि क़लम को आपकी दुआएं मोहब्बत की कमी महसूस न होने दीजियेगा।
मेरा आभार सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म के लिए जो मेरी क़लम को करोड़ों रीडर्स तक पहुचाने का सेतु बने है–अगर इनका साथ नहीं मिलता तो "एक और मधुशाला" कागज़ के पन्नों पर ही बिखरी रहती––
भावो के एक एक मोती को शब्दों के धागे से गूंथकर साज सज्जा के साथ आप तक पहुँचाने वाला यह माध्यम इसलिए आभार का हक़दार है क्योकि क़लमकार को उसके पाठक वर्ग से रूबरू करने की अहम भूमिका अदा करता है।
आइये अब दिल की गली से चलते है––––अगर डॉ बच्चन जी की "मधुशाला नहीं पढ़ी होती तो। "एक और मधुशाला" मेरे दिल से चलकर क़लम से न उतरी होती और न ही मुझे यह बोध हुआ होता कि कवि बच्चन ने आखिर " मधुशाला" का सृजन कैसे कर दिया और न ही यह रहस्य आज आप तक पहुँच पाता और न ही "एक और मधुशाला" का प्याला आपको पकड़ा पाता कवि जब विज्ञानं की कसोटी पर चलता है तो परिकल्पना के साथ प्रयोग भी करता है और दुनियां तक अपने प्रयोग का निष्कर्ष भी देता है और वो आज अपने प्रिय पाठक वर्ग को समर्पित कर रहा हूं।मेरी शुरुआत डॉ बच्चन के " मधुशाला" लिखने की वज़ह से है।मैंने जिनसे प्रेरणा लेकर लिखा उनकी उस राह के पद चिन्हों को देखने की कोशिश की कि उन्होंने वो सब क्यों लिखा जो मुझे ख़ुमारी से तर कर गया।फैसला आप कीजिये––
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