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मैं कहा हूं

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#व्यथा यशोधरा  मैं कहाँ हूँ .. सुनो सिद्धार्थ, जब तुम खोज रहे थे जीवन मे दुख का कारण तब मैं जूझ रही थी नन्हे राहुल के मासूम सवालों से वो सवाल, जो उसके पिता के लिए थे। तुम थे व्यथित मृत्यु से  तुम थे  व्यथित बीमारी से  तुम व्यथित थे बुढ़ापे से.. कहाँ जान पाए तुम कि व्यथा इन सबसे परे होती है.. मृत्यु दुख नही है, मृत्यु तो मुक्त करती है दुख जीवन होता है वह जीवन जो साथी के पलायन के बाद  पीछे बचता है.. बुढ़ापा तो सिर्फ प्रकृति की एक अवस्था है। अभिशप्त तो यौवन होता है जो तुम्हारे जाने के बाद मेरे पास था.. शरीर के रोग का तो फिर भी इलाज है, पर मन का रोग जो तुम छोड़ गए मेरे पास तुम्हारे दर्शन में उसका कोई जिक्र आया या नही.. मेरे परोसे थाल को ठुकराकर आखिर तुमने ग्रहण किया  सुजाता की खीर का पात्र। क्या तब भी नही गुन सके कि भूख एक शास्वत सत्य है। तुम्हारे बौद्ध विहार में आम्रपाली सी नगर वधू भी स्थान पा सकी नही समा पाए तो बस पत्नी और पुत्र? इस दुःख का भी दर्शन खोज सके हो क्या? सुनो सिद्धार्थ, दसो दिशाओं  दिग-दिगांतर तक विस्तृत हुआ तुम्हारा दर्शन तुम्हारा ...

तर्पण

अर्पण में समर्पण था पर तर्पण में विछोह है और जब कोई हालात ऐसे हो जिनमे दर्द के साथ अपनी जिम्मेदारी के सही रूप से निर्वाह नहीं करने का पछतावा भी हो तब इंसान के लिए बहुत तकलीफदेह स्थिति हो जाती है। काव्यात्मक अंदाज में वो सब कुछ लिखा है जो दर्द सहा है..... तर्पण अगर कोई पुत्र अपने पिता के अंतिम समय पर उपस्थित होकर अपने कर्तव्य का पालन न कर सके तो यह कसक ता उम्र उसके दिल को कचोटती रहती है। वक्त की दी इस चोट का दर्द में आज भी महसूस कर रहा हूँ-- आज भी मेरी आँखों में कैद है वक्त का वो काला पन्ना––– कदमो के नीचे से जैसे जमीन का खिसक सा जाना– याद है सर से जैसे अचानक बरगद की छांव का सरक सा जाना व् अनाथ सा हो जाने की पीड़ा–– –दुनियादारी का कड़वा सच और पिता की छत्र छाया न होने से जमाने का बदलता रंग ।नहीं भूल सकता पिता का संघर्ष और उत्कर्ष––और आखिरी मोड़ में यह अभागा पुत्र अपना कन्धा तक नहीं दे  सका आज भी अपने ही दिल की धिक्कार सुनता हूँ और कई बार तन्हा रोता भी हूँ।सुना है कि वक्त के साथ यादे कमज़ोर हो जाती है पर मुझे तो मेरे पापा दो दशक गुज़र जाने के बाद आज भी वैसे ही याद आते है। आज भावों के पात्र...

एक और मधुशाला ..मन की बात

एक और मधुशाला"> (मन की बात) क़लम चलाने के लिए या तो जीवन की कोई घटना प्रेरणा बनती है या फिर कोई साहित्य कृति या रचना मन में भावनाओं की लहरों को मचलने का कारक बनती है।  शब्दों का मज़मा यु ही नहीं लगता कभी कोई अश्क़ का कतरा सागर बन जाता है या कोई मुस्कान सावन बन जाती है।कभी कोई नज़र आरपार हो जाती है या कभी कोई पलक छांव बन जाती है। कोई भी रचना कागज पर तब यु उतरती है जैसे फ़लक पर बादलों की घटाए उमड़ती है या फिर समन्दर में मौजे मचलती है––कुछ ऐसे ही" एक और मधुशाला" का सफ़र शुरू होता है जब डॉ हरिवंश राय बच्चन जी की कृति "मधुशाला" पलकों के नीचे आती है और एक एक रुबाई मन के पैमाने को जीवन के विभिन्न रंगो से भरती जाती है।मधुशाला के पन्नों की मादकता मेरी नज़रो से होकर मेरे दिल में इतने गहरे उतर जाती है कि वहां से "एक और मधुशाला" की नदी निकल जाती है। प्रकृति में नदी समन्दर में मिलती है पर यहाँ तो मधुशाला के समंदर से "एक और मधुशाला"की नदी निकलती है। मेरी यह कृति ""मधुशाला"" और उसके रचियता शब्द पुरुष डॉ हरिवंश राय वच्चन को समर्पित करने से पह...

मेरा परिचय जानना चाहेंगे!

मेरा परिचय जानना चाहेंगे! परिचय क्या कहूं बतौर परिचय - आपका अपना हूँ--- आपकी आँखों के सपने कह रहा हूँ --आपके दिल की धड़कनों की सरगम सुन रहा हूँ और वो आपको लिख रहा हूँ। एक कलमकार का परिचय उसकी कलम से निकले शब्द और दिल से उमड़े भाव और कागज़ के वे पन्ने होते हैं जिसमें वो ज़माने को लिखता और ज़िंदगियों को कहता है। परिचय उसके शब्दों में  छिपा सावन भी होता है और अश्कों से लबालब तरानों के मुखड़ों का समन्दर भी होता है। बस मुझे मेरे शब्दों से पढ़कर अपने दिलों में खोजिए, मेरा परिचय आपके लबों से निकले, कोई नाम व पैग़ाम बनकर, तब मेरी यह साधना सफ़ल होगी और मेरा सफ़र आगे की मंज़िल को तय करेगा। अर्पण डॉ बच्चन जी को विन्रम भाव से समर्पित– उनकी कलम उत्प्रेरक  और उनकी कृति मधुशाला के एक एक आख़र में भरी मादकता ने मेरी क़लम में खुमार ही भर दिया.. सोचता हूँ जिसकी क़लम में इतनी मादकता थी  वो शख्स फिर कितना मादक रहा होगा? एक और मधुशाला को इन भावों के साथ महाकवि को अर्पण कर रहा हूँ––––– प्रेरक बने श्री बच्चन बनी प्रेरणा मधुशाला शब्द पुष्प् से सजा रहा हूँ भाव वंदन की माला है अर्पण उनको  मेरी ह्रदय साग...

एक और मधुशाला:संजय सनम

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खुमारी जब जिक्र मधुशाला का है तो ख़ुमारी तो होगी ही और अलग अलग मायने से होगी----- ख़ुमारी सिर्फ शराब से भरे जाम से ही नहीं आती वो तो नज़रों में भरी शराब से भी आती है और हसीना के हुस्न के अंदाज पर भी आती है। ख़ुमारी  इश्क़ के आदाब पर भी आती है --महबूब के इंतजार पर भी आती है और बेक़रार दिल के क़रार पर भी आती है। ख़ुमारी तो कभी किसी नाम पर भी आती है--वो तो कभी किसी की अदा और अंदाज पर भी आती है और कभी कभी तो मादक आवाज़ पर भी आती है। ख़ुमारी शब्दों से भरे कागज़ और उन आखरों में बोलती मोहब्बत और दर्द भरे इंतजार की बोलती क़लम के कलाम पर भी आती है। सच पूछिये तो कभी यार पर आती है कभी बेक़रार पर भी आती है कभी उसके प्यार पर आती है तो कभी इक़रार पर आती है। यह नशा है जिंदगी का-कभी किसी की याद पर भी आती है तो कभी तन्हा रात पर भी आती है। कुछ इन राहों से गुजरती मेरी क़लम की यह दास्तां है मेरे दिलवर। कही मयखाने की मचलती अंगूरी तो कही साकी की मादकता---पता नहीं किस किस की आई है और मेरी क़लम ने भी स्याही की जगह उसे ही पिया और जो जिया वो लिख दिया। कभी किसी के अश्क़ भी ------तो कत्ल कर देते है और मतवाला बना द...